नई दिल्ली: Supreme Court of India ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें राजस्थानी भाषा को शिक्षक भर्ती परीक्षाओं और स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया है कि वह चरणबद्ध और प्रगतिशील तरीके से राज्य के सभी सरकारी एवं निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में लागू करने हेतु सकारात्मक और समयबद्ध कदम उठाए।
अदालत ने राज्य सरकार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुरूप मातृभाषा आधारित शिक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक व्यापक नीति तैयार करने का भी निर्देश दिया। साथ ही, 25 सितंबर 2026 तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है।
यह सिविल अपील पदम मेहता एवं अन्य द्वारा दायर की गई थी, जिसमें राजस्थान हाई कोर्ट, जोधपुर द्वारा 27 नवंबर 2024 को डी.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 5294/2021 में पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में यह मांग उठाई थी कि राजस्थान पात्रता परीक्षा शिक्षक (REET)-2021 के तहत शिक्षक ग्रेड-III, लेवल-I एवं लेवल-II भर्ती परीक्षा के पाठ्यक्रम में राजस्थानी भाषा को शामिल किया जाए तथा बच्चों को राजस्थानी अथवा संबंधित स्थानीय भाषा में शिक्षा प्रदान की जाए। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि रिट ऑफ मंडामस तभी जारी की जा सकती है जब याचिकाकर्ता किसी प्रवर्तनीय कानूनी अधिकार और राज्य की वैधानिक जिम्मेदारी को स्थापित करें।
न्यायमूर्ति Vikram Nath और न्यायमूर्ति Sandeep Mehta की पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने निर्णय लिखते हुए कहा कि अपनी भाषा में समझने और समझे जाने की क्षमता केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि अस्तित्वगत अधिकारों का प्रश्न है, क्योंकि किसी भी व्यक्ति की सार्थक सामाजिक भागीदारी के लिए समझ का होना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि कानून द्वारा शासित समाज में भाषा की उपलब्धता संवैधानिक महत्व रखती है।
संवैधानिक एवं विधिक ढांचे पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि संविधान सभा ने भाषा के विषय को अत्यंत महत्व देते हुए संविधान के भाग XVII को समर्पित किया था। साथ ही, सातवें संविधान संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 350A जोड़ा गया, जिसका उद्देश्य राज्यों को भाषाई अल्पसंख्यकों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने हेतु पर्याप्त सुविधाएं प्रदान करने के लिए बाध्य करना था।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कोठारी आयोग (1964-66) ने त्रिभाषा सूत्र की सिफारिश की थी, जिसमें मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा को प्रथम शिक्षण भाषा बनाने की बात कही गई थी। इस सिफारिश को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में अपनाया गया तथा 1986 और 1992 की नीतियों में भी दोहराया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29(2)(f) पर जोर दिया, जिसके अनुसार पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रक्रिया तैयार करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जहां तक संभव हो, शिक्षा का माध्यम बच्चे की मातृभाषा हो। अदालत ने कहा कि किसी अपरिचित भाषा में दी गई शिक्षा न केवल प्रभावी समझ में बाधा उत्पन्न करती है, बल्कि बच्चे के बुनियादी विकास को भी प्रभावित कर सकती है और उसमें अलगाव की भावना पैदा कर सकती है।
अदालत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का भी उल्लेख किया, जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों संस्थानों में कम से कम कक्षा 5 तक और संभव हो तो कक्षा 8 तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाए जाने की सिफारिश की गई है।
मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के संवैधानिक अधिकार पर अदालत ने कहा कि यह अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है, क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ऐसी भाषा में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है जो व्यक्ति के लिए सार्थक और समझने योग्य हो। अदालत ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा विद्यार्थियों की वैचारिक स्पष्टता और ज्ञान तक सार्थक पहुंच सुनिश्चित करती है। इस संदर्भ में अदालत ने State of Karnataka v. Associated Management of English Medium Primary and Secondary Schools [(2014) 9 SCC 485] मामले का भी हवाला दिया।
राजस्थान सरकार ने यह दलील दी थी कि केवल संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में ही शिक्षा दी जाती है और राजस्थानी भाषा अभी उसमें शामिल नहीं है। राज्य ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 350A केवल निर्देशात्मक है और इससे कोई प्रवर्तनीय अधिकार उत्पन्न नहीं होता। इसके अतिरिक्त, राज्य ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को मात्र एक कार्यकारी नीति बताते हुए कहा कि उसका कोई वैधानिक बल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की इन दलीलों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि नीति की अनुपस्थिति को संवैधानिक दायित्वों से बचने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने राज्य के रुख को “संकीर्ण और उदासीन” बताते हुए कहा कि यह संवैधानिक अनिवार्यता से बचने का तकनीकी प्रयास है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वर्तमान में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर; महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर; और राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर जैसे संस्थानों में राजस्थानी भाषा पढ़ाई जा रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भाषा को संस्थागत और शैक्षणिक मान्यता प्राप्त है। अदालत ने कहा कि केवल आठवीं अनुसूची में शामिल न होने के आधार पर स्कूल स्तर पर राजस्थानी भाषा को मान्यता न देना अत्यधिक तकनीकी और अनुचित दृष्टिकोण है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार जब संवैधानिक अधिकारों को मान्यता दे दी जाती है, तो उन्हें केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा अधिकार, जिसका प्रभावी क्रियान्वयन न हो, वस्तुतः अधिकार नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि जब केंद्र सरकार स्वयं विधायी और नीतिगत ढांचे के माध्यम से बच्चों को उनकी समझ की भाषा में शिक्षा देने की आवश्यकता को स्वीकार कर चुकी है, तब राज्यों पर भी यह दायित्व बनता है कि वे इस अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु समयबद्ध और उद्देश्यपूर्ण कदम उठाएं। अदालत ने यह भी कहा कि वह संवैधानिक ढांचे, वैधानिक कानूनों और बाध्यकारी न्यायिक निर्णयों के तहत मान्यता प्राप्त अधिकारों के क्षरण की मूक दर्शक नहीं बनी रह सकती।
हालांकि, अदालत ने माना कि REET-2021 से संबंधित मूल राहत अब निष्प्रभावी हो चुकी है, क्योंकि भर्ती प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है और अंतिम रूप ले चुकी है। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि यह मामला व्यापक संवैधानिक महत्व के प्रश्नों से जुड़ा है, इसलिए व्यापक स्तर पर दिशा-निर्देश जारी करना आवश्यक है।
मामला: Padam Mehta and Another v. State of Rajasthan and Others [Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 1425 of 2025; 2026 INSC 476]
